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खवासा

दे धक्का…मरीजों की जिंदगी की जिम्मेदारी वाली एम्बुलेंस खुद मांग रही सहारा….

खवासा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की तस्वीर ने खोली स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल, सड़क पर लोगों के सहारे आगे बढ़ती दिखी आपातकालीन एम्बुलेंस…

खवासा@आनंदीलाल सिसोदिया/आयुष पाटीदार

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खवासा से सामने आई एक तस्वीर स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर रही है। तस्वीर में आपातकालीन सेवा के लिए तैनात एम्बुलेंस को कुछ लोग पीछे से धक्का लगाते हुए दिखाई दे रहे हैं। जिस वाहन का काम मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचाकर उसकी जान बचाने में मदद करना है, वही वाहन सड़क पर लोगों के सहारे आगे बढ़ता नजर आए तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है।

सोचिए, अगर इसी समय किसी गंभीर मरीज को तत्काल अस्पताल पहुंचाने की जरूरत पड़ जाए और एम्बुलेंस ही चलने की स्थिति में न हो तो क्या होगा? आपातकालीन स्थिति में एक-एक मिनट बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में एम्बुलेंस की उपलब्धता के साथ-साथ उसका चालू हालत में और जरूरत के समय तत्काल रवाना होने योग्य रहना भी बेहद जरूरी है।
एम्बुलेंस को धक्का, फिर कैसे दौड़ेगी मरीज की जिंदगी…?

खवासा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की यह तस्वीर केवल एक वाहन को धक्का लगाने की तस्वीर नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती दिखाई दे रही है। यदि किसी मरीज को अचानक गंभीर हालत में रेफर करना पड़े, दुर्घटना का मरीज हो या किसी गर्भवती महिला को तत्काल अस्पताल ले जाने की जरूरत हो, तब एम्बुलेंस की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।

ऐसे में सवाल यह है कि आपातकालीन सेवा के नाम पर तैनात वाहन की नियमित जांच और रखरखाव की जिम्मेदारी आखिर किसकी है..? क्या संबंधित विभाग द्वारा समय-समय पर एम्बुलेंस की तकनीकी स्थिति जांची जाती है..? अगर जांच होती है तो फिर सड़क पर लोगों को इसे धक्का क्यों लगाना पड़ा..?

सरकार स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करती है, लेकिन जमीन पर तस्वीर क्या कहती है.?

सरकार ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के दावे करती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को बेहतर सुविधाओं से लैस करने और आपातकालीन सेवाओं को मजबूत करने पर लगातार जोर दिया जाता है। लेकिन खवासा से सामने आई यह तस्वीर इन दावों की जमीनी स्थिति पर सवाल खड़ा करती है।

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