रायपुरिया@राजेश राठौड़
आधुनिक दौर में जहां संजा बाई के पारंपरिक स्वरूप की जगह बाजार में मिलने वाली तैयार आकृतियों ने ले ली है, वहीं रायपुरिया के पुष्पेंद्र सिंह राठौर अपनी बेटी युवंशी राठौर को करीब छह वर्षों से संजा बाई की पुरानी परंपरा से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। वे अपनी बेटी के साथ मिलकर गोबर से पारंपरिक पद्धति से संजा बाई की आकृति तैयार करवाते आ रहे हैं।
पुष्पेंद्र सिंह चाहते तो बाजार से आधुनिक तरीके से तैयार संजा बाई खरीदकर दीवार पर चिपका सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनका मानना है कि जिस तरह पुराने समय में बालिकाएं गोबर से संजा बाई की आकृतियां बनाकर इस परंपरा को जीवित रखती थीं, उसी परंपरा और संस्कृति की जानकारी आज की पीढ़ी को भी मिलनी चाहिए।
रायपुरिया में करीब 1500 घरों की बस्ती है, लेकिन वर्तमान समय में गोबर से पारंपरिक रूप से निर्मित संजा बाई की आकृति मात्र एक स्थान पर दिखाई देना इस बात का संकेत है कि बदलते समय के साथ यह लोक परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है।
पुष्पेंद्र सिंह राठौर बताते हैं कि बच्चों को हम जैसी शिक्षा और संस्कार देंगे, बच्चे वही ग्रहण करेंगे। आज के बच्चे आधुनिक युग में जीना चाहते हैं, ऐसे में उन्हें हमारी पुरानी परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं, खेल और संस्कृति से परिचित कराना बेहद जरूरी है। उनका कहना है कि बच्चों को धर्म और संस्कृति से जुड़ी चीजों की जानकारी बचपन से ही दी जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी परंपराओं को भूल न जाए।
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