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रायपुरिया

श्राद्ध पक्ष शुरू होते ही गूंजने लगे संजा बाई के गीत, बदलते दौर में सिमटती जा रही लोकपरंपरा…

रायपुरिया@राजेश राठौड़

श्राद्ध पक्ष शुरू होते ही अंचल में संजा बाई के पारंपरिक गीत सुनाई देने लगे हैं। हालांकि समय के साथ संजा बाई के स्वरूप और इसे मनाने के तरीके में भी बदलाव आया है। आधुनिक दौर में जहां पहले घरों की दीवारों पर गोबर से संजा बाई का स्वरूप बनाया जाता था, वहीं अब कागज पर चित्र बनाकर दीवार पर चिपकाने का चलन बढ़ गया है। शाम होते ही छोटी-छोटी बालिकाएं एकत्र होकर संजा बाई के गीत गाती हैं।

लोकमान्यता के अनुसार श्राद्ध पक्ष के इन सोलह दिनों में माता पार्वती अपने मायके आती हैं और यहीं निवास करती हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने अच्छे वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत की शुरुआत की थी। तभी से कुंवारी कन्याओं द्वारा संजा बाई की पूजा और व्रत करने की परंपरा चली आ रही है।

लगभग दो दशक पहले तक अंचल के अधिकांश सनातनी परिवारों में घर की दीवार पर गाय के गोबर से संजा बाई का स्वरूप बनाया जाता था। शाम होते ही बालिकाओं के समूह अपनी सहेलियों के घर पहुंचते और संजा बाई बनाने में एक-दूसरे की मदद करते थे। इसके बाद सामूहिक रूप से आरती और पारंपरिक लोकगीत गाए जाते थे।

संजा बाई के गीतों में लोकजीवन, हास्य, पारिवारिक रिश्तों और ग्रामीण संस्कृति की झलक देखने को मिलती थी। बालिकाएं रोजाना अलग-अलग गीत गाकर इस परंपरा को जीवंत रखती थीं। इनमें एक पारंपरिक गीत की पंक्तियां हैं

“संजा तू थारे घर जा, थारी बाई मारेगी,
डेली में ढचकेगा, छोटी-सी गाड़ी लुढ़ती जाए।
जिसमें बैठी संजा बाई, काजल की लुगाई,
काजल टीकी लाई ने, मारी संजा बाई ने दो…”

अब कुछ घरों तक सिमटी परंपरा

समय के साथ बदलती जीवनशैली और आधुनिकता का असर संजा बाई की परंपरा पर भी पड़ा है। पहले जहां मोहल्लों में शाम होते ही बालिकाओं के सामूहिक गीत गूंजते थे, वहीं अब इक्का-दुक्का घरों में ही संजा बाई का स्वरूप देखने को मिलता है। कई स्थानों पर गोबर से आकृति बनाने की जगह कागज पर बनाए गए चित्रों का उपयोग किया जा रहा है।

संजा बाई की परंपरा केवल पूजा और व्रत तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह बालिकाओं को आपस में जोड़ने, लोकगीतों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाने और लोकसंस्कृति को जीवित रखने का माध्यम भी रही है। बदलते दौर में इसके स्वरूप में भले ही बदलाव आया हो, लेकिन संजा बाई के गीत आज भी अंचल की लोकस्मृति में अपनी पहचान बनाए हुए हैं।

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