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रायपुरिया@राजेश राठौड़
करीब 20 से 25 साल पहले सावन महीने की शुरुआत होते ही गांवों में एक अलग ही नजारा देखने को मिलता था। ग्वाले अपने पशुओं को चराने के लिए जंगल की ओर ले जाते थे। उनके हाथों में बांस से बनी बांसुरी हुआ करती थी। जंगल में गूंजती बांसुरी की मधुर धुन वातावरण को संगीतमय बना देती थी।
शाम को जब मवेशी अपने-अपने घरों की ओर लौटते थे, तब भी ग्वाले बांसुरी बजाते हुए उनके साथ चलते थे। उस समय बांसुरी केवल मनोरंजन का साधन नहीं थी, बल्कि ग्रामीण जीवन और पशुपालकों की दिनचर्या का एक अहम हिस्सा हुआ करती थी।
आज बांसुरी की वह मधुर आवाज धीरे-धीरे गुम हो गई है। हालांकि काजबी के हुमा भाई डामर ने अपने बुजुर्गों की इस धरोहर को आज भी संभालकर रखा है। वे सुबह-शाम बांसुरी बजाते हैं और पुरानी परंपरा को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं।
हुमा भाई डामर बताते हैं कि आधुनिक युग में बांसुरी की जगह अब मोबाइल फोन ने ले ली है। मोबाइल आज लोगों के हाथ में रहता है, जबकि पहले ग्वालों के हाथ में बांसुरी हुआ करती थी। बांसुरी बजाने से मनोरंजन भी होता था और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति भी।
वे कहते हैं कि पहले गांवों में बड़ी संख्या में मवेशी और गायें हुआ करती थीं, लेकिन अब उनकी संख्या नाममात्र रह गई है। चरनोई की जमीन भी पहले जैसी नहीं बची है। पहले खेती-किसानी के अधिकांश काम बैलों के माध्यम से होते थे, लेकिन अब ट्रैक्टर और आधुनिक मशीनों ने उनकी जगह ले ली है।
ग्वालों का जीवन भगवान श्रीकृष्ण से गहराई से जुड़ा हुआ माना जाता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण जब गौ माता को चराने जंगल में ले जाते थे, तब बांसुरी बजाकर उन्हें रिझाते थे। बांसुरी की धुन सुनकर गायें उनके पास चली आती थीं। ग्रामीण जीवन में भी ग्वालों और पशुओं के बीच ऐसा ही प्रेम है
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